Maa Shakumbhari Devi

जयकारा शेरावाली दा

सच्चे दरबार की जय

।। जय माँ शाकम्भरी देवी ।।

।।। जय-माता-दी ।।।

।।। जय-माता-दी ।।।

।।। जय-माता-दी ।।।

माता शाकम्भरी देवी मंदिर

ये मंदिर शक्तिपीठ है और यहां सती का शीश यानि सिर गिरा था । मंदिर में अंदर मुख्य प्रतिमा शाकुंभरी देवी के दाईं ओर भीमा और भ्रामरी और बायीं ओर शताक्षी देवी प्रतिष्ठित हैं । शताक्षी देवी को शीतला देवी के नाम से भी संबोधित किया जाता है । कहते हैं कि शाकुंभरी देवी की उपासना करने वालो के घर शाक यानि कि भोजन से भरे रहते हैं शाकुंभरी देवी की कथा के अनुसार एक दैत्य जिसका नाम दुर्गम था उसने ब्रहमा जी से वरदान में चारो वेदो की प्राप्ति की और यह वर भी कि मुझसे युद्ध में कोई जीत ना सके वरदान पाकर वो निरंकुश हो गया तो सब देवता देवी की शरण में गये और उन्होने प्रार्थना की । ऋषियो और देवो को इस तरह दुखी देखकर देवी ने अपने नेत्रो में जल भर लिया । उस जल से हजारो धाराऐं बहने लगी जिनसे सम्पूर्ण वृक्ष और वनस्पतियां हरी भरी हो गई । एक सौ नेत्रो द्धारा प्रजा की ओर दयापूर्ण दृष्टि से देखने के कारण देवी का नाम शताक्षी प्रसिद्ध हुआ । इसी प्रकार जब सारे संसार मे वर्षा नही हुई और अकाल पड गया तो उस समय शताक्षी देवी ने अपने शरीर से उत्पन्न शाको यानि साग सब्जी से संसार का पालन किया । इस कारण पृथ्वी पर शाकंभरी नाम से विख्यात हुई ।

माँ शाकम्भरी देवी के भवन से लगभग एक किमी पहले बाबा भूरादेव का मंदिर है। भूरादेव के प्रथम दर्शन कर यात्री आगे प्रस्थान करते हैं। आगे का मार्ग पथरीला है जो एक खोल से होकर जाता है। वर्षा ऋतु मे खोल मे पानी भी आ जाता है। तब यात्रा स्थगित कर देनी चाहिए क्योंकि पानी का बहाव अधिक होता है। थोड़ा आगे चलने पर माँ शाकम्भरी देवी प्रवेश द्वार आता है। कुछ और आगे चलने पर माता का भवन दिखाई देने लगता है। माता के मंदिर मे प्रवेश करने से पहले श्रध्दालु पंक्ति मे लग जाते हैं और सीढिया चढकर माता के भवन मे पहुंच जाते हैं। माता के गर्भगृह मे माता शाकम्भरी देवी दाहिने भीमा, भ्रामरी और बाल गणेश तथा बायें और शताक्षी देवी की प्रतिमा विराजमान है। ये प्रतिमाएँ काफी प्राचीन है। लेकिन माता शाकम्भरी देवी की प्रतिमा अधिक प्राचीन है बाकी प्रतिमाओं को आदिगुरु शंकराचार्य जी ने स्थापित किया था। मंदिर की परिक्रमा मे कई देवी-देवताओ के लघु मंदिर बने हुए हैं।

माता का मंदिर चारों और से पहाडियों से घिरा हुआ है जिनकी ऊंचाई 500 से 800 मीटर तक है। इस क्षेत्र मे बेर, बेलपत्र, सराल, तुरड, महव्वा,आंवला,तेंदू, कढाई, शीशम, खैर, सराल, आम, जामुन, डैक,अमलतास, पलाश,नीम, सांगवान, साल आदि के पेड़ अत्यधिक पाये जाते है। इसके अतिरिक्त शिवालिक की ये पहाडियां आयुर्वेद औषधियों से परिपूर्ण है। इस क्षेत्र मे बंदर, काले मुंह वाले लंगूर, हाथी, हिरन, चित्तल, जंगली बकरे, मुर्गे, तोते, सेह, बलाई, लोमडे, गुलदार, माहें, तेंदुए आदि वन्य जीव निवास करते हैं। शाकम्भरी देवी सिद्धपीठ के उत्तर की और सात किमी दूर सहंस्रा ठाकुर धाम है जोकि प्राकृतिक आभा से परिपूर्ण है। सहंस्रा ठाकुर के पास ही प्राचीन गौतम ऋषि की गुफा, सुर्यकुंड आदि पवित्र स्थान है। शाकम्भरी देवी मंदिर के पास ही माता छिन्नमस्ता देवी और मनसा देवी का संयुक्त मंदिर है। माता छिन्नमस्ता का मंदिर चार शिव मंदिरों के बीच मे है पूर्व मे कमलेश्वर महादेव,पश्चिम मे शाकेश्वर महादेव, उत्तर मे वटुकेश्वर महादेव और दक्षिण मे इन्दरेश्वर महादेव के मंदिर है। माता शाकम्भरी देवी के मंदिर से एक फर्लांग आगे पहाडियों के बीच प्राचीन रक्तदंतिका देवी का मंदिर है जिसका जीर्णोद्धार 1968 के लगभग मे हुआ था। रक्तदंतिका मंदिर से कुछ आगे महाकाली की प्राचीन गुफा भी है। माता शाकंभरी देवी मंदिर के बारे में मान्यता है कि नवरात्र की चतुर्दशी पर यहां शेर भी शीश नवाने के लिए आता था। जब माता का शेर यहां शीश नवाने के लिए आता था तब सभी भक्त रास्ता छोड़ देते थे और शेर शीश नवाकर चुपचाप चला जाता था। आज आसपास आबादी होने की वजह से शेर तो नही आता लेकिन शेर के आने के आने के प्रमाण जरूर मिलते हैं। इस मंदिर के बारे में ऐसी भी धारणा है कि इस मंदिर परिक्षेत्र में तेल से कोई भी खाद्य पदार्थ नहीं बनाया जाता था अगर कोई भूलवश भी तेल से खाद्य पदार्थ बनाने की कोशिश भी करता था तो उसकी दुकान में आग लग जाती थी इसलिए यहां पर सभी भोजन सामग्री घी से बनाई जाती थी।


भूरा देव मंदिर

भूरा देव मंदिर

माता के दर्शन से पहले यहां मान्यता है कि भूरा देव के दर्शन करने पडते है । श्री दुर्गासप्तशती पुस्तक में शाकुंभरी देवी का वर्णन आता है कि जब एक बार देवताओ और दानवो में युद्ध चल रहा था जिसमें दानवो की ओर से शुंभ ,निशुंभ, महिषासुर आदि बडे बडे राक्षस लड रहे थे तो देवता उनसे लडते लडते शिवालिक की पहाडियो में छुप छुपकर विचरण करने लगे और जब बात ना बनी तो नारद मुनि के कहने पर उन्होने देवी मां से मदद मांगी । इसी बीच भूरादेव अपने पांच साथियो के साथ मां की शरण में आया और देवताओ के साथ मिलकर लडने की आज्ञा मांगी । मां ने वरदान दिया और युद्ध होने लगा । राक्षसेा की ओर से रक्तबीज नाम का असुर आया जिसकी खून की एक बूंद गिरने पर एक और उसी के समान असुर पैदा हो जाता था । मां ने विकराल रूप धरकर और चक्र चलाकर इन सब दानवो को मार डाला । माता काली ने खप्पर से रक्तबीज का सिर काटकर उसका सारा खून पी लिया जिससे नये असुर पैदा नही हुए पर इस बीच शुंभ और निशुंभ ने भूरादेव के बाण मार दिया जिससे वो गिर पडा । युद्ध समाप्त होने के बाद माता ने भूरादेव को जीवित कर वरदान मांगने को कहा तो उन्होने हमेशा मां के चरणो की सेवा मांगी जिस पर माता ने वरदान दिया कि जो भी मेरे दर्शन करेगा उसे पहले भूरादेव के दर्शन करने होंगे तभी मेरी यात्रा पूरी होगी ।

भूरा देव का मंदिर माता के मंदिर से एक किलोमीटर पहले है । भूरा देव के दर्शन करने के बाद ही माता के दर्शनो के लिये जाते है ।

माता छिन्नमस्ता देवी मंदिर

Chhinmastika Devi Mandir

माता छिन्नमस्ता देवी मंदिर

शाकम्भरी देवी मंदिर के पास ही माता छिन्नमस्ता देवी और मनसा देवी का संयुक्त मंदिर है। माता छिन्नमस्ता का मंदिर चार शिव मंदिरों के बीच मे है पूर्व मे कमलेश्वर महादेव,पश्चिम मे शाकेश्वर महादेव, उत्तर मे वटुकेश्वर महादेव और दक्षिण मे इन्दरेश्वर महादेव के मंदिर है।


माता भ्रामरी देवी

माता भ्रामरी देवी आदिशक्ति का ही एक स्वरुप है। दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में दिये गये अपने वचनों के अनुसार आदिशक्ति जगत जननी जगदम्बा ने शुम्भ- निशुंभ तथा वैप्रचित दानवों का वध के साथ- साथ दुर्गमासुर और अरुणासुर दानवों के वध का आश्वासन देवताओं को दिया था। दुर्गा सप्तशती के अनुसार माता ने योगमाया देवी,रक्तदंतिका, शताक्षी,शाकम्भरी, दुर्गा, भीमा और भ्रामरी देवी के अवतारों की स्वयं भविष्यवाणी की थी।

माता भीमा देवी

माता भीमा देवी महाशक्ति जगदंबा शाकम्भरी देवी का ही एक स्वरूप है। माँ भीमा देवी हिमालय और शिवालिक पर्वतों पर तपस्या करने वालों की रक्षा करने वाली देवी है। जब हिमालय पर्वत पर असुरों का अत्याचार बढा तब भक्तों के निवेदन से महामाया ने भीमा देवी का भयानक भयनाशक रूप धारण किया। माँ भीमा देवी का प्रमुख मंदिर हरियाणा राज्य के पिंजौर के समीप स्थित है। माँ भीमा देवी नीले वर्ण वाली और चार भुजाओं मे चंद्रहास नामक तलवार, कपाल और डमरू धारण करती है। माँ भीमा देवी की एक प्रतिमा सिद्धपीठ माँ शाकम्भरी देवी जी के मंदिर मे भी है जो कि सहारनपुर की शिवालिक पर्वमाला मे विराजमान है।दुर्गा सप्तशती के मूर्ति रहस्य के अनुसार-

भीमापि नीलवर्णा सा दंष्ट्रादशनभासुरा। विशाललोचना नारी वृत्तपीनपयोधरा चन्द्रहासं च डमरुं शिर: पात्रं च बिभ्रती। एकावीरा कालरात्रि: सैवोक्ता कामदा स्तुता। अर्थात: भीमादेवी का वर्ण भी नीला ही है। उनकी दाढें और दाँत चमकते रहते हैं। उनके नेत्र बडे-बडे हैं,माँ का स्वरूप स्त्री का है। वे अपने हाथों में चन्द्रहास नामक खड्ग, डमरू, मस्तक और पानपात्र धारण करती हैं। वे ही एकवीरा, कालरात्रि तथा कामदा कहलाती और इन नामों से प्रशंसित होती हैं।

माँ शताक्षी देवी

माँ शताक्षी देवी जगतजननी जगदंबा भुवनेश्वरी देवी का ही एक स्वरूप है। प्राचीन काल मे दुर्गमासुर नामक महादैत्य के उपद्रव से तीनों लोको मे हाहाकार मच गया और सौ वर्षों तक जल की वर्षा नही हुई। संपूर्ण पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड गया। तब देवता महादेवी का ध्यान, जप, पूजन और स्तुति करने के विचार से हिमालय पर्वत पर गये। देवी के प्रकट होने पर स्तुति करते हुए बोले: महेशानी घोर संकट उपस्थित हैं तुम इससे हमारी रक्षा करो। तब देवी ने अपने अद्भुत रूप के दर्शन कराये जिनकी पूरी देह पर सौ आंखे थी। माता का स्वरूप नीले रंग का था और आंखे नीलकमल के सदृश्य थी। चारों भुजाओं मे कमल धनुष बाण और शाक- समूह धारण किये हुए थी। माता के सौ नेत्रों से नौ दिन तक अश्रुवृष्टि हुई और संपूर्ण धरातल हरी- भरी हो गई। नदियाँ, तालाब आदि जल से परिपूर्ण हो गये। सौ नयनों से देखने के कारण देवी का स्वरूप शताक्षी देवी नाम से सदा के लिए अमर हो गया। देवी शताक्षी ने उसके बाद दिव्य रूप धारण किया और अपने शरीर से विभिन्न कंदमूल, शाक, फल इत्यादि प्रकट कर सब जीवो की बुभुक्षा को शांत किया और शाकम्भरी देवी के नाम से प्रसिद्ध हो गई। शाकम्भरी देवी ने दुर्गमासुर दैत्य का वध कर दिया और दुर्गा देवी के नाम से अमर हो गई। वास्तव मे लोक प्रसिद्ध शताक्षी, शाकम्भरी तथा दुर्गा ये एक ही देवी के नाम है।